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इक आग का दरिया है

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( ट्रांसफ़ॉर्मेशन एन्ड लॉ ऑफ़ फ़्री विल )

भिक्षु अहिंसक भिक्षाटन के लिए निकले हुए थे। सुनसान वन मार्ग में कराहने की आवाज़ आती थी। आगे बैलगाड़ी में प्रसव पीड़ा से एक स्त्री जूझ रही थी। परिवार के लोग निकट थे। वैद्य के पास ले जाते हुए अचानक इस स्त्री की स्थिति बिगड़ने लगी। उसकी असह्य पीड़ा अहिंसक को विचलित कर रही थी। वे भागते हुए वापस जेतवन पहुँचे और तथागत को सब बात बताई।

तथागत बोले, “अहिंसक, उस स्त्री के पास जाओ और कहना मैंने जब से जन्म लिया, जानबूझ कर किसी का हृदय नहीं दुखाया। किसी ने मुझसे सहायता माँगी तो मैंने यथासम्भव सहायता की। मैंने कभी कोई अच्छा कर्म किया हो तो वह सद्भावनापूर्ण कर्म तरंग के रूप में तुम्हारी पीड़ा के स्थान पर एकत्रित हो और तुम्हें कष्ट मुक्त करे।”

“पर यह तो असत्य है, तथागत। मैंने तो लोगों को अनेक कष्ट दिये हैं।” अहिंसक ने चिंतित होकर कहा।

“तब अहिंसक, तुम कहना कि जब से भिक्षु रूप में मेरा पुनर्जन्म हुआ तब से।” तथागत बोले।

अहिंसक भागते हुए उस बैलगाड़ी तक पहुँचे और पूरे प्राण से तथागत के वचन को दोहराया। कुछ ही देर में वह स्त्री पीड़ामुक्त हो गयी।

यही भिक्षु अहिंसक बुद्ध से मिलने के पहले अंगुलिमाल के नाम से जाना जाने वाला शैतान था जो लोगों की अंगुलियाँ काट कर अंगुली-माला पहनता था। अंगुलिमाल का साधु अहिंसक होना ही ऊर्जा-रूपांतरण की प्रक्रिया है। कथा सत्य न हो, तो भी सांकेतिक रूप से सद्भाव के बल की संस्तुति करती है।

समाज की प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में एक मज़े की बात मित्र ने कही थी कि वे क्या सोचेंगे, यदि हम भी यही सोचें तो फिर वे क्या सोचेंगे। यूँ यह लाओत्से की उस गूढ़ बात का व्हाट्सएपिक वर्ज़न है कि किसी अन्य के पूर्वाग्रह या धारणाओं का आखेट मत बनो। वरना तुम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकोगे। मुझसे कोई पूछे कि मुझे जीवन में क्या पाना है तो मैं कहूँगी कि बिना किसी व्यवहारिक दबाव के हँसी और रुलाई वाले तरल क्षणों को बार-बार पाना है। पाते ही चले जाना है। वास्तव में इन क्षणों को पा कर पकड़ा नहीं जा सकता। केवल अपनी तैयारी की जा सकती है कि हम इस आंतरिक दशा को अर्जित कर सकें।

यशेतु से उस छोटी-सी मुलाकात के पहले गहरी खिन्नता का एक लम्बा अध्याय है, जिसके हर पन्ने से लहूलुहान मन रिसता था। परम उचाट के उन दिनों में मेरे कुछ उतने ही पक्के दोस्त थे, जितनी पक्की मेरी खिन्नता थी। लम्बी और सघन प्रक्रियाओं में स्वयं को झोंककर मैं उन आत्महंता पीड़ाओं से बाहर आ पायी थी। बाह्यता छँटने लगी, एकांतिकता में रस मिलने लगा। इधर मैं कुछ शांत और सन्तुलित होने लगी, उधर मित्र नदारद। मित्रों के ही आचरण से मुझे आभास हुआ कि मेरे दुःख से उनकी उपस्थिति का अहं पुष्ट होता रहा होगा। अतः नदारद होना स्वाभाविक ही था। मगर इतना काफ़ी न था। विविध लाक्षणिक व्यञ्जनाओं में मुझ पर आक्रमण भी होने लगे। उस समय तो मैंने कभी पलट कर उत्तर नहीं दिया और आज मेरा जीवन ही मेरा उत्तर है। अपना प्रेम अपना ही उत्तरदायित्व होता है। इस उत्तरदायित्व में उसकी भी कोई भागीदारी नहीं, जिसे हमने अपने प्रेम के लिए चुना। सो उन मित्रों से संबंध-शून्य करके सद्भावना को भीतर सहेज लिया। कुछ समय ही भीतर शिकायत रही, फिर इस शिकायत से भी बाहर आना होता है और अपने ऊपर किसी तरह के दबाव से भी मुक्त होना होता है। हर मनुष्य अपनी गति के लिए ही उत्तरदायी है। जिनसे पीड़ा मिली, वास्तव में वे मित्र भी नहीं जानते कि मैं अपने जीवन में उनका कल्याण-मित्र की तरह सम्मान करती हूँ। एक तरफ़ जीवन की समझ समृद्ध करने वाले कल्याण मित्र मिले थे तो दूसरी तरफ़ ऐसा परिवार, साथी और कुछ प्रेम करने वाले कि जिनका होना ही जीवन के प्रति कृतज्ञ बना देता है। ज़ेन में कहते हैं कि जीवन में मित्र व शत्रु नहीं होते, केवल शिक्षक होते हैं। मैं उन चंद सौभाग्यशालियों में हूँ, जिसे शिक्षकों की कभी कमी नहीं पड़ी।

“सवालों के

जवाब आएँ न आएँ,

पुकार का जवाब ज़रूर आता है।”

 

ये पंक्तियाँ २०१७ में लिखी कविता ‘शिवप्रिया’ से हैं। अदृश्य घाटियों में बरसों तलक मैं पुकारती रही, प्रतिध्वनियाँ दृश्य रूप धर कर मुझ तक लौटने लगीं। सतत परिवर्तन और मुक्तिगामी मार्ग की अनगिनत कथाएँ हैं। कितने सारे सन्दर्भहीन आकस्मिक प्रसंग हैं, कितनी ही उथल-पुथल मचाने वाली घटनाएँ हैं, कितनी सघन प्रक्रियाएँ हैं और सबसे बढ़कर जीवन की गरिमा है, जिसकी धूप में एक मनुष्य की परछाईं बनती है। एक मोटे उपन्यास में भी बाँधना चाहूँ तो यह सब समाहित नहीं हो सकता। कविता में भी पूरी नदी कहाँ अट पाती है ? केवल जल के थोड़े छींटे पड़ते हैं।

बुद्ध को मैं ऊर्जा-रूपांतरण का वैज्ञानिक कहती हूँ। इस कार्य के लिए उनके पास अनेक युक्तियाँ मिलती हैं। इधर महर्षि रमण का भी स्मरण होता है। रमण के बारे में हमारे मौलश्री वाले बाग़ी बाबा कहते हैं कि वे इतने सरल रहे जैसे कोई बच्चा हो। इतनी पारदर्शिता और सादगी कि उनके सामने सहज ही समर्पण घट जाए। इसमें समर्पित होने वाले की कोई महिमा नहीं, बल्कि यह रमण की सहजता का प्रभाव है कि उनकी उपस्थिति में रूपान्तरण अनायास घटता है। मगर बुद्ध तो फिर बुद्ध हैं। वे तर्कसंगत हैं, कुछ तिकड़म लगाकर उपचार करते हैं। फिर यहाँ एक बात और है। वो यह कि इस आग के दरिया में फ़्री विल का सिद्धांत काम करता है। लॉ ऑफ़ फ़्री विल, यानी जब तक स्वेच्छा से या परिस्थितिवश कोई पहला पग न बढ़ाये, स्वयं बुद्ध भी कुछ नहीं कर सकते।

एक बार दसवीं जमात के मानस ने मुझसे सिल्विया प्लाथ की मृत्यु का कारण पूछा था। तब मैंने उसे कहा कि मृत्यु की बजाय हमें जन्म का कारण ढूँढ़ना होगा। सिल्विया का भर नहीं, बल्कि स्वयं अपना भी। जीवन जीने या बिताने का कारण नहीं, उतने के लिए तो हमारा परिवार या किसी कलात्मक अभिरुचि का होना भी बहुत है। पर हमें उस कारण को ढूँढ़ लेना चाहिए, जिसके लिए हमने जन्म लिया। इस पृथ्वी ग्रह पर तो एक नदी का जन्म भी अकारण नहीं होता, फिर हम भला कैसे यूँ ही चले आए होंगे। एक छोटी-मोटी नदी तो वृक्ष में भी बहती है, फूलों में भी, पत्तियों में भी। हम तो फिर भी मनुष्य हैं। उस नदी के जल से विद्युत उत्पन्न कर लेना और जीवन रोशन करना भी ऊर्जा- रूपांतरण की ही विधि है।

इधर ऊर्जा-रूपांतरण पर लिख रही हूँ तो क्यों न अवसाद की भी थोड़ी बात कर ली जाए। पीछे के कुछ दिनों में मैंने कई लोगों से यह सुना कि अवसाद ठीक भी हो जाता है। तब मैं यही कहूँगी कि उनसे अवसाद को बूझने और जूझने में कुछ भूल हुई है। अवसाद जीवन में व्यर्थता-बोध से पैदा होता है। एक बार निस्सारता को जान चुकने के बाद क्या कोई फिर अंजान बन सकता है ? संभव नहीं है। दवाई-गोली के असर से न्यूरॉन्स की कबड्डी को कुछ दिनों के लिए रोका जा सकता है, मगर हमेशा के लिए नहीं। इसे समझ लेना होगा कि अवसाद की प्रकृति प्रेम की तरह ही है। वह आता भर है, जाता नहीं।

तब क्या किया जाए ? तब स्मरण किया जाए कि यह संसार भले व्यर्थ हो रहे, मगर इसमें घटित एक भी घटना, एक भी वस्तु, एक भी भाव निरर्थक नहीं हो सकता। अंगुलिमाल जैसे हत्यारे को भी प्रकृति ने व्यर्थ नहीं जाने दिया। गोली-दवाइयों का काम इतना है कि वे थोड़ा सन्तुलित कर दें। उसके आगे का काम तो मनुष्य को स्वयं करना होता है। फिर होता यह है कि मनुष्य सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाता है। अब जब व्यर्थता समझ आ गयी तब रोने को बचा क्या ? तब वह बेलौस हँसी उतरती है। तब वह अवसाद ही रूपान्तरित होकर प्रसाद बन जाता है। परिस्थितियाँ थोड़े ही बदल गईं कि अवसाद ठीक हो जाएगा। लेकिन आप बदल गए। चाहे इसे अवसाद का ठीक होना कहें, चाहे कांशसनेस शिफ़्ट कह लें। अपने ही लिमिटिंग बिलीफ़ सिस्टम को फोड़ कर अगले डायमेंशन तक सतत इवॉल्व होने की प्रक्रिया।

अवसाद मनुष्य को जगाने के लिए ही घटता है मगर वह गोलियाँ खाकर सोते हुए बीता जा रहा है। गोलियों से थोड़ा ठीक हुआ, फिर वापस वहीं। फिर थोड़ा ठीक हुआ, फिर वापस वहीं। यह दुष्चक्र चलता ही रहता है जब तक मनुष्य इस पैटर्न को तोड़ने के लिए तैयार न हो जाये।

न प्रेम का लक्ष्य ब्याह रचा कर बच्चे पैदा करना भर है, न अवसाद की नियति कलाओं में खप जाने भर की है। दोनों का एक ही काम है : जगाना। फिर जागने के बाद थोड़ा चलना भी होगा। अनेक व्यर्थताओं की गठरी को उतारकर नीचे रखना भी होगा ताकि यात्रा भारहीन हो। अब जाग भी गए तो कहाँ चल दें ? चलना होता है अपने मूल में लौटने के लिये।

और यह जान लें कि संसार की इस कंटकाकीर्ण यात्रा को पूर्ण करने का कोई एक ही मार्ग नहीं है। ज़ेन जीवन में यह प्रसिद्ध कहावत है : जहाँ हो, वही मार्ग है।

विद्यार्थी पूछते हैं, आगे क्या करें ? किस राह चलें ? उनसे कहती हूँ, जो तुम्हारे स्वभाव के अनुरूप हो। जैसा तुम्हें जँचे। पिछले सत्र में दसवीं कक्षा के ही अनन्य ने कहा, विकल्प ढेरों हैं। मन भी रह-रह कर यहाँ से वहाँ डोल जाता है। कैसे निर्णय लें फिर ? अंत क्या है ? मैंने कहा, इसी में तो सारा जादू है। मार्ग तो ढेरों है, अंत मगर एक ही है।

 

वह राह

जो नहीं जाती

मक्का को

पहुँचाती है आख़िर में

मक्का ही

 

बाबुषा कोहली

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