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राज कुमार कुम्भज हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्वर हैं। 12 फ़रवरी 1947 को जन्मे राज कुमार कुम्भज स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी और किसान परिवार से आते हैं। छात्र-जीवन से ही वे सक्रिय राजनीतिक चेतना से जुड़े रहे, जिसके कारण उन्हें पुलिस-प्रशासन की प्रताड़नाओं का भी सामना करना पड़ा। बिहार प्रेस विधेयक 1982 के विरोध में उनका सशक्त, मौलिक और चर्चित प्रदर्शन हिंदी पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इतिहास में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे संवेदनशील, विनोदप्रिय, ज़िंदादिल और स्वतंत्र पत्रकार रहे हैं। उनकी कविताएँ अनेक महत्वपूर्ण और चर्चित कविता-संकलनों में संकलित की गई हैं तथा देश की लगभग सभी प्रमुख और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनका निरंतर प्रकाशन होता रहा है। राज कुमार कुम्भज, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा संपादित चौथा सप्तक के कवि हैं। अब तक उनकी चार दर्जन से अधिक स्वतंत्र कविता-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो उन्हें समकालीन हिंदी कविता के सबसे विपुल और प्रतिबद्ध रचनाकारों में स्थापित करती हैं। आवाज़घर से प्रकाशित उस एक अकेले मकान में उनका नवीनतम कविता संग्रह है, जो उनके काव्य संसार की गहराई, संवेदना और वैचारिक विस्तार को नए सिरे से सामने लाता है।

Rajkumar Kumbhaj

राज कुमार कुम्भज हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्वर हैं। 12 फ़रवरी 1947 को जन्मे राज कुमार कुम्भज स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी और किसान परिवार से आते हैं। छात्र-जीवन से ही वे सक्रिय राजनीतिक चेतना से जुड़े रहे, जिसके कारण उन्हें पुलिस-प्रशासन की प्रताड़नाओं का भी सामना करना पड़ा। बिहार प्रेस विधेयक 1982 के विरोध में उनका सशक्त, मौलिक और चर्चित प्रदर्शन हिंदी पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इतिहास में विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

वे संवेदनशील, विनोदप्रिय, ज़िंदादिल और स्वतंत्र पत्रकार रहे हैं। उनकी कविताएँ अनेक महत्वपूर्ण और चर्चित कविता-संकलनों में संकलित की गई हैं तथा देश की लगभग सभी प्रमुख और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनका निरंतर प्रकाशन होता रहा है।

राज कुमार कुम्भज, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा संपादित चौथा सप्तक के कवि हैं। अब तक उनकी चार दर्जन से अधिक स्वतंत्र कविता-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो उन्हें समकालीन हिंदी कविता के सबसे विपुल और प्रतिबद्ध रचनाकारों में स्थापित करती हैं।

आवाज़घर से प्रकाशित उस एक अकेले मकान में उनका नवीनतम कविता संग्रह है, जो उनके काव्य संसार की गहराई, संवेदना और वैचारिक विस्तार को नए सिरे से सामने लाता है।

Author's books

Us ek Akele Makan Mein

₹280.00

चॉकलेट खाने का सिलसिला

चलता ही रहता था

के बीच में आ टपके थे

२६ जनवरी और १५ अगस्त जैसे दिन

तब तक तो बेहद गरम हो जाना चाहिए था तंदूर

उस एक अकेले मकान में