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सितोलिया

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तीसरी बार तब, जब दिया गया उसका हाथ
किसी अजनबी के हाथ में
रखा गया हथेली पर आटे का गोला
कन्या दान था या पिंड दान
हथेलियों पर छूट गई हल्दी भर याद है उसे

चौथी बार तब, जब हाथों में आने लगे
कभी अचानक गर्म कड़ाई
तपते तवे के निशान
फिर हाथ चलते रहे दिन रात
कभी घर बुहारते,
कभी कपड़ों का मैल उतारते
छुड़ाते बर्तनों की जूठन, चलते रहे हाथ
घर दफ्तर के साथ गृहस्थी का हिसाब लगाते
परिवार के संकट में माला फिराते
जाप दोहराते चलते रहे हाथ
अपने हिस्से की मिठाई नहीं
ख्वाहिशो को इन्ही हाथो से किया किनारे
इन्ही हाथों से बांधे दरवाजे पर बंदनवार
जिस घर में उसकी देहरी रसोई की चौखट पर
खत्म हो जाती थी

उस रोज़ मेंहदी लगाने बैठी जब
गौर से देखे हाथ
मेंहदी लगाए भी
तो कहां, हाथों पर जगह जगह
उतर आए हैं चिट्टे
जगह जगह हड्डियां, नसें उभर आई हैं

सितोलिया का दाम
पूरा नहीं हुआ अब तक
दान की भी मियाद बाकी है

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