Author: बाबुषा कोहली

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बारूद

दुनिया को तहस नहस कर डालने के लिए जितना बारूद ज़रूरी है उससे रत्ती भर ज़्यादा ही था मेरी छाती के अंदर मेरे सिर पर लगा होता कम-अज़-कम सात हत्याओं का पाप एक लीचड़ अफ़सर, एक लुच्चा टीचर, एक लम्पट लीडर, एक लबार आशिक़, एक लिज्झड़ दोस्त और गुलाब के दो मासूम फूल सब बच […]

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मृत्यु पर्व

फ़र्ज़ करो, तुम यह जान चुके हो ; कि कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है. क्या करोगे दिन भर आज ? बीमा की आख़िरी किस्त चुकाओगे या शराब पियोगे ? मंदिर जाओगे या तलत महमूद को सुनोगे – ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो वक़ील को बुलाकर वसीयत लिखोगे […]

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प्राण की पतंग और श्वास का माझा

इधर कोविड विज़िट के बाद तन में हज़ार बरसों की थकान भर गयी थी। कोई चोट नहीं जो किसी मरहम से सूख जाए, न ही कोई पीड़ा या ताप, जो दवा-गोली के असर से कुछ कम हो रहे। बस थकान, जैसे न जाने कितने प्रकाशवर्षों से पैदल चल रही होऊँ। और इसके ठीक उलट भीतर […]

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इक आग का दरिया है

( ट्रांसफ़ॉर्मेशन एन्ड लॉ ऑफ़ फ़्री विल ) भिक्षु अहिंसक भिक्षाटन के लिए निकले हुए थे। सुनसान वन मार्ग में कराहने की आवाज़ आती थी। आगे बैलगाड़ी में प्रसव पीड़ा से एक स्त्री जूझ रही थी। परिवार के लोग निकट थे। वैद्य के पास ले जाते हुए अचानक इस स्त्री की स्थिति बिगड़ने लगी। उसकी […]

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