Author: गुलज़ार

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पूरे का पूरा आकाश घुमाकर बाज़ी देखी मैंने

पूरे का पूरा आकाश घुमाकर बाज़ी देखी मैंने काले घर में सूरज चलकर तुमने शायद सोचा था मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे मैं एक चराग़ जलाकर रौशनी कर ली अपना रस्ता खोल लिया तुमने एक समंदर हाथ में लेकर मुझपे ढेल दिया मैंने नूह की कश्ती उस पर रख दी काल चला तुमने और मेरी […]

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